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Write Beyond Borders के सभी भाषा संस्करण एक ही बौद्धिक मूल को साझा करते हैं, जिसे विभिन्न सांस्कृतिक आवाज़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।


कॉपीराइट सूचना

(हिंदी संस्करण)

© कॉपीराइट 2025
Write Beyond Borders
सर्वाधिकार सुरक्षित।

इस पत्रिका में प्रकाशित सभी लेख, कहानियाँ, कविताएँ, शोध-लेख, चित्र, डिज़ाइन और अन्य सामग्री उनके संबंधित लेखकों एवं प्रकाशक की बौद्धिक संपत्ति हैं।

प्रकाशक की पूर्व लिखित अनुमति के बिना इस पत्रिका या इसके किसी भी भाग को किसी भी रूप में — चाहे वह मुद्रित हो, डिजिटल हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या अन्य किसी माध्यम से — पुनः प्रकाशित, पुनरुत्पादित, संग्रहित या प्रसारित करना कानूनन निषिद्ध है।

यह पत्रिका विभिन्न लेखकों के विचारों और अभिव्यक्तियों को प्रस्तुत करती है। प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार आवश्यक नहीं कि संपादकीय मंडल या प्रकाशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करें।


प्रकाशक

Write Beyond Borders

प्रधान संपादक

Sarwat Parvez


📌 यह कॉपीराइट पृष्ठ पत्रिका की औपचारिक और कानूनी पहचान का हिस्सा है।



संपादकीय एवं सलाहकार मंडल

(HINDI – Magazine Post)

संपादकीय मंडल

प्रधान संपादक
Sarwat Parvez
लेखक | शोधकर्ता | संपादक
संस्थापक, Write Beyond Borders
समग्र संपादकीय दृष्टि और अंतिम निर्णय के उत्तरदायी।

अंग्रेज़ी संपादक
Dr. Jonathan Miles (लंदन, यूनाइटेड किंगडम)
साहित्यिक आलोचक | वैश्विक व सांस्कृतिक अध्ययन

उर्दू संपादक
प्रो. आरिफ़ हुसैन (लाहौर, पाकिस्तान)
उर्दू साहित्य, कविता और आलोचना

हिंदी संपादक
Dr. Neha Verma (नई दिल्ली, भारत)
हिंदी साहित्य एवं समकालीन अध्ययन

तकनीकी संपादक
Ayaan Khan
कंप्यूटर इंजीनियर एवं आईटी प्रोफेशनल
डिजिटल प्रकाशन और तकनीकी संरचना के प्रभारी।


सलाहकार एवं समीक्षा मंडल (अंतरराष्ट्रीय)

यह मंडल अकादमिक मार्गदर्शन, चयनित रचनाओं की समीक्षा और बौद्धिक गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।




📑 विषय-सूची

(हिंदी संस्करण)

संपादकीय

प्रधान संपादक की मेज़ से
Sarwat Parvez ………………………………………….. 1


विशेष लेख

ध्यान का युग:
21वीं सदी में ध्यान कैसे सबसे मूल्यवान मुद्रा बन गया

Jonathan Miles (लंदन, यूके) …………………………… 4


लघु कथा

अंतिम संकेत
Ayesha Rahman (कराची, पाकिस्तान) ……………………….. 12


वैश्विक परिदृश्य

बिना युद्धभूमि के युद्ध:
डिजिटल युग में संघर्ष

Daniel Roth (बर्लिन, जर्मनी) …………………………… 18


इतिहास एवं सभ्यताएँ

वे साम्राज्य जो युद्ध के बिना ढह गए
Michael Grant (ऑक्सफोर्ड, यूके) ………………………… 25


समाज और संस्कृति

शोरगुल भरी दुनिया में
कहानियाँ आज भी क्यों महत्वपूर्ण हैं

Sophia Alvarez (मैड्रिड, स्पेन) ………………………… 31


काव्य खंड

मौन और समय पर तीन कविताएँ
Kavita Sharma (जयपुर, भारत) …………………………… 36


दर्शन

क्या अर्थ के लिए विश्वास आवश्यक है?
Omar Siddiqui (टोरंटो, कनाडा) …………………………. 40


विज्ञान और मन

ध्यान और लत का मनोविज्ञान
Dr. Ethan Cole (बोस्टन, अमेरिका) ……………………….. 45


हास्य / व्यंग्य

खुद पर हँसना
Nikhil Verma (मुंबई, भारत) ……………………………. 50


समापन टिप्पणी

Write Beyond Borders:
विचारों के साझा मंच के रूप में
……………………………. 54




संपादकीय

प्रधान संपादक की मेज़ से

— Sarwat Parvez

इक्कीसवीं सदी को केवल तकनीकी प्रगति का युग कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह वह समय है जिसमें मानव का सबसे मूल्यवान संसाधन — ध्यान — निरंतर छीना जा रहा है।
सूचनाओं की अधिकता ने विचार की गहराई को प्रभावित किया है, और गति ने ठहराव को।

Write Beyond Borders का उद्देश्य एक ऐसा साझा मंच बनाना है जहाँ विचारों को समय मिले, भाषा बाधा न बने, और चिंतन को केवल आँकड़ों तक सीमित न किया जाए।
यह अंक साहित्य, दर्शन, विज्ञान, इतिहास और हास्य के माध्यम से उसी ठहराव की तलाश है।

यदि ये पृष्ठ आपको कुछ क्षण रुककर सोचने पर मजबूर करें — तो हमारा उद्देश्य पूरा हुआ।

प्रधान संपादक


ध्यान का युग

21वीं सदी में ध्यान कैसे सबसे मूल्यवान मुद्रा बन गया

— Jonathan Miles (लंदन, यूके)

आज की दुनिया में ध्यान सबसे महँगी मुद्रा बन चुका है।
ध्यान न तो संग्रहित किया जा सकता है, न ही पुनः प्राप्त—एक बार खो जाए तो बस खर्च हो जाता है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हमारे ध्यान को खंडित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। हर सूचना, हर नोटिफ़िकेशन, हर शीर्षक हमें खींचता है।
इस प्रक्रिया में गहन सोच, धैर्य और सहानुभूति क्षीण होती जा रही हैं।

ध्यान को पुनः प्राप्त करना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध का कार्य है।


लघु कथा

अंतिम संकेत

— Ayesha Rahman (कराची, पाकिस्तान)

संदेश रात 2:17 बजे आया।

कोई नाम नहीं। कोई विवरण नहीं।
सिर्फ़ एक पंक्ति:
“यह तुम्हारा अंतिम संकेत है।”

दिन सामान्य बीता, पर भीतर कुछ बदल चुका था।
रात को जब शहर की रोशनी बुझी, उसने पहली बार स्पष्ट देखा—
कुछ संकेत डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए होते हैं


वैश्विक परिदृश्य

बिना युद्धभूमि के युद्ध: डिजिटल युग में संघर्ष

— Daniel Roth (बर्लिन, जर्मनी)

आधुनिक युद्ध अब सीमाओं पर नहीं लड़े जाते।
साइबर हमले, सूचना युद्ध और मनोवैज्ञानिक प्रभाव नए हथियार हैं।

इन युद्धों में सैनिक दिखाई नहीं देते, लेकिन प्रभाव गहरे होते हैं—
अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और सामाजिक विश्वास पर।

आज सुरक्षा का अर्थ केवल सेना नहीं,
बल्कि सूचना की समझ भी है।


इतिहास एवं सभ्यताएँ

वे साम्राज्य जो युद्ध के बिना ढह गए

— Michael Grant (ऑक्सफोर्ड, यूके)

इतिहास बताता है कि कई साम्राज्य तलवार से नहीं,
बल्कि आंतरिक क्षय से गिरे।

भ्रष्टाचार, असमानता और नैतिक पतन
किसी भी बाहरी शत्रु से अधिक घातक सिद्ध हुए।

इतिहास की ये चेतावनियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।


समाज और संस्कृति

शोरगुल भरी दुनिया में कहानियाँ आज भी क्यों मायने रखती हैं

— Sophia Alvarez (मैड्रिड, स्पेन)

कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं—
वे समाज की आत्मा होती हैं।

जहाँ एल्गोरिदम सामग्री परोसते हैं,
वहीं कहानियाँ अर्थ प्रदान करती हैं।

शोर के इस युग में,
कहानी ही वह साधन है
जो हमें मनुष्य बनाए रखता है।


काव्य खंड

मौन और समय पर तीन कविताएँ

— Kavita Sharma (जयपुर, भारत)

मौन
शब्द थक जाएँ
तो मौन बोलता है।

समय
समय आगे बढ़ता है,
पर उसकी छाया
हमारे भीतर रह जाती है।

स्मृति
हम अतीत को नहीं,
उसके स्पर्श को याद रखते हैं।


दर्शन

क्या अर्थ के लिए विश्वास आवश्यक है?

— Omar Siddiqui (टोरंटो, कनाडा)

क्या बिना विश्वास के जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है?
तर्क दिशा देता है,
पर विश्वास स्थिरता।

अर्थ शायद उसी बिंदु पर जन्म लेता है
जहाँ प्रश्न और आस्था
एक-दूसरे का विरोध नहीं,
पूरक बनते हैं।


विज्ञान और मन

ध्यान और लत का मनोविज्ञान

— Dr. Ethan Cole (बोस्टन, अमेरिका)

मानव मस्तिष्क निरंतर उत्तेजना के लिए नहीं बना।
डिजिटल वातावरण न्यूरोलॉजिकल इनाम प्रणालियों का दुरुपयोग करता है।

ध्यान की लत
केवल आदत नहीं,
बल्कि जैविक परिवर्तन है।

समाधान केवल इच्छाशक्ति नहीं—
संरचना का पुनःनिर्माण है।


हास्य / व्यंग्य

खुद पर हँसना

— Nikhil Verma (मुंबई, भारत)

हम दुनिया पर हँसते हैं,
पर खुद पर नहीं।

जबकि खुद पर हँस पाना
परिपक्वता की निशानी है।

हास्य वह दर्पण है
जो बिना तोड़े
सच दिखा देता है।


समापन टिप्पणी

Write Beyond Borders: विचारों का साझा मंच

यह पत्रिका किसी निष्कर्ष का दावा नहीं करती—
यह केवल संवाद का निमंत्रण है।

यदि यह अंक
आपको सोचने, ठहरने
या मुस्कुराने पर मजबूर करे,
तो यही इसकी सफलता है।

Magazine Hindi हिन्दी मैग्ज़ीन

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Write Beyond Borders के सभी भाषा संस्करण एक ही बौद्धिक मूल को साझा करते हैं, जिसे विभिन्न सांस्कृतिक आवाज़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।


कॉपीराइट सूचना

(हिंदी संस्करण)

© कॉपीराइट 2025
Write Beyond Borders
सर्वाधिकार सुरक्षित।

इस पत्रिका में प्रकाशित सभी लेख, कहानियाँ, कविताएँ, शोध-लेख, चित्र, डिज़ाइन और अन्य सामग्री उनके संबंधित लेखकों एवं प्रकाशक की बौद्धिक संपत्ति हैं।

प्रकाशक की पूर्व लिखित अनुमति के बिना इस पत्रिका या इसके किसी भी भाग को किसी भी रूप में — चाहे वह मुद्रित हो, डिजिटल हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या अन्य किसी माध्यम से — पुनः प्रकाशित, पुनरुत्पादित, संग्रहित या प्रसारित करना कानूनन निषिद्ध है।

यह पत्रिका विभिन्न लेखकों के विचारों और अभिव्यक्तियों को प्रस्तुत करती है। प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार आवश्यक नहीं कि संपादकीय मंडल या प्रकाशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करें।


प्रकाशक

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प्रधान संपादक

Sarwat Parvez


📌 यह कॉपीराइट पृष्ठ पत्रिका की औपचारिक और कानूनी पहचान का हिस्सा है।



संपादकीय एवं सलाहकार मंडल

(HINDI – Magazine Post)

संपादकीय मंडल

प्रधान संपादक
Sarwat Parvez
लेखक | शोधकर्ता | संपादक
संस्थापक, Write Beyond Borders
समग्र संपादकीय दृष्टि और अंतिम निर्णय के उत्तरदायी।

अंग्रेज़ी संपादक
Dr. Jonathan Miles (लंदन, यूनाइटेड किंगडम)
साहित्यिक आलोचक | वैश्विक व सांस्कृतिक अध्ययन

उर्दू संपादक
प्रो. आरिफ़ हुसैन (लाहौर, पाकिस्तान)
उर्दू साहित्य, कविता और आलोचना

हिंदी संपादक
Dr. Neha Verma (नई दिल्ली, भारत)
हिंदी साहित्य एवं समकालीन अध्ययन

तकनीकी संपादक
Ayaan Khan
कंप्यूटर इंजीनियर एवं आईटी प्रोफेशनल
डिजिटल प्रकाशन और तकनीकी संरचना के प्रभारी।


सलाहकार एवं समीक्षा मंडल (अंतरराष्ट्रीय)

यह मंडल अकादमिक मार्गदर्शन, चयनित रचनाओं की समीक्षा और बौद्धिक गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।




📑 विषय-सूची

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संपादकीय

प्रधान संपादक की मेज़ से
Sarwat Parvez ………………………………………….. 1


विशेष लेख

ध्यान का युग:
21वीं सदी में ध्यान कैसे सबसे मूल्यवान मुद्रा बन गया

Jonathan Miles (लंदन, यूके) …………………………… 4


लघु कथा

अंतिम संकेत
Ayesha Rahman (कराची, पाकिस्तान) ……………………….. 12


वैश्विक परिदृश्य

बिना युद्धभूमि के युद्ध:
डिजिटल युग में संघर्ष

Daniel Roth (बर्लिन, जर्मनी) …………………………… 18


इतिहास एवं सभ्यताएँ

वे साम्राज्य जो युद्ध के बिना ढह गए
Michael Grant (ऑक्सफोर्ड, यूके) ………………………… 25


समाज और संस्कृति

शोरगुल भरी दुनिया में
कहानियाँ आज भी क्यों महत्वपूर्ण हैं

Sophia Alvarez (मैड्रिड, स्पेन) ………………………… 31


काव्य खंड

मौन और समय पर तीन कविताएँ
Kavita Sharma (जयपुर, भारत) …………………………… 36


दर्शन

क्या अर्थ के लिए विश्वास आवश्यक है?
Omar Siddiqui (टोरंटो, कनाडा) …………………………. 40


विज्ञान और मन

ध्यान और लत का मनोविज्ञान
Dr. Ethan Cole (बोस्टन, अमेरिका) ……………………….. 45


हास्य / व्यंग्य

खुद पर हँसना
Nikhil Verma (मुंबई, भारत) ……………………………. 50


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विचारों के साझा मंच के रूप में
……………………………. 54




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प्रधान संपादक की मेज़ से

— Sarwat Parvez

इक्कीसवीं सदी को केवल तकनीकी प्रगति का युग कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह वह समय है जिसमें मानव का सबसे मूल्यवान संसाधन — ध्यान — निरंतर छीना जा रहा है।
सूचनाओं की अधिकता ने विचार की गहराई को प्रभावित किया है, और गति ने ठहराव को।

Write Beyond Borders का उद्देश्य एक ऐसा साझा मंच बनाना है जहाँ विचारों को समय मिले, भाषा बाधा न बने, और चिंतन को केवल आँकड़ों तक सीमित न किया जाए।
यह अंक साहित्य, दर्शन, विज्ञान, इतिहास और हास्य के माध्यम से उसी ठहराव की तलाश है।

यदि ये पृष्ठ आपको कुछ क्षण रुककर सोचने पर मजबूर करें — तो हमारा उद्देश्य पूरा हुआ।

प्रधान संपादक


ध्यान का युग

21वीं सदी में ध्यान कैसे सबसे मूल्यवान मुद्रा बन गया

— Jonathan Miles (लंदन, यूके)

आज की दुनिया में ध्यान सबसे महँगी मुद्रा बन चुका है।
ध्यान न तो संग्रहित किया जा सकता है, न ही पुनः प्राप्त—एक बार खो जाए तो बस खर्च हो जाता है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हमारे ध्यान को खंडित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। हर सूचना, हर नोटिफ़िकेशन, हर शीर्षक हमें खींचता है।
इस प्रक्रिया में गहन सोच, धैर्य और सहानुभूति क्षीण होती जा रही हैं।

ध्यान को पुनः प्राप्त करना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध का कार्य है।


लघु कथा

अंतिम संकेत

— Ayesha Rahman (कराची, पाकिस्तान)

संदेश रात 2:17 बजे आया।

कोई नाम नहीं। कोई विवरण नहीं।
सिर्फ़ एक पंक्ति:
“यह तुम्हारा अंतिम संकेत है।”

दिन सामान्य बीता, पर भीतर कुछ बदल चुका था।
रात को जब शहर की रोशनी बुझी, उसने पहली बार स्पष्ट देखा—
कुछ संकेत डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए होते हैं


वैश्विक परिदृश्य

बिना युद्धभूमि के युद्ध: डिजिटल युग में संघर्ष

— Daniel Roth (बर्लिन, जर्मनी)

आधुनिक युद्ध अब सीमाओं पर नहीं लड़े जाते।
साइबर हमले, सूचना युद्ध और मनोवैज्ञानिक प्रभाव नए हथियार हैं।

इन युद्धों में सैनिक दिखाई नहीं देते, लेकिन प्रभाव गहरे होते हैं—
अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और सामाजिक विश्वास पर।

आज सुरक्षा का अर्थ केवल सेना नहीं,
बल्कि सूचना की समझ भी है।


इतिहास एवं सभ्यताएँ

वे साम्राज्य जो युद्ध के बिना ढह गए

— Michael Grant (ऑक्सफोर्ड, यूके)

इतिहास बताता है कि कई साम्राज्य तलवार से नहीं,
बल्कि आंतरिक क्षय से गिरे।

भ्रष्टाचार, असमानता और नैतिक पतन
किसी भी बाहरी शत्रु से अधिक घातक सिद्ध हुए।

इतिहास की ये चेतावनियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।


समाज और संस्कृति

शोरगुल भरी दुनिया में कहानियाँ आज भी क्यों मायने रखती हैं

— Sophia Alvarez (मैड्रिड, स्पेन)

कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं—
वे समाज की आत्मा होती हैं।

जहाँ एल्गोरिदम सामग्री परोसते हैं,
वहीं कहानियाँ अर्थ प्रदान करती हैं।

शोर के इस युग में,
कहानी ही वह साधन है
जो हमें मनुष्य बनाए रखता है।


काव्य खंड

मौन और समय पर तीन कविताएँ

— Kavita Sharma (जयपुर, भारत)

मौन
शब्द थक जाएँ
तो मौन बोलता है।

समय
समय आगे बढ़ता है,
पर उसकी छाया
हमारे भीतर रह जाती है।

स्मृति
हम अतीत को नहीं,
उसके स्पर्श को याद रखते हैं।


दर्शन

क्या अर्थ के लिए विश्वास आवश्यक है?

— Omar Siddiqui (टोरंटो, कनाडा)

क्या बिना विश्वास के जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है?
तर्क दिशा देता है,
पर विश्वास स्थिरता।

अर्थ शायद उसी बिंदु पर जन्म लेता है
जहाँ प्रश्न और आस्था
एक-दूसरे का विरोध नहीं,
पूरक बनते हैं।


विज्ञान और मन

ध्यान और लत का मनोविज्ञान

— Dr. Ethan Cole (बोस्टन, अमेरिका)

मानव मस्तिष्क निरंतर उत्तेजना के लिए नहीं बना।
डिजिटल वातावरण न्यूरोलॉजिकल इनाम प्रणालियों का दुरुपयोग करता है।

ध्यान की लत
केवल आदत नहीं,
बल्कि जैविक परिवर्तन है।

समाधान केवल इच्छाशक्ति नहीं—
संरचना का पुनःनिर्माण है।


हास्य / व्यंग्य

खुद पर हँसना

— Nikhil Verma (मुंबई, भारत)

हम दुनिया पर हँसते हैं,
पर खुद पर नहीं।

जबकि खुद पर हँस पाना
परिपक्वता की निशानी है।

हास्य वह दर्पण है
जो बिना तोड़े
सच दिखा देता है।


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तो यही इसकी सफलता है।

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