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बदलती दुनिया में इंसान की पहचान
अनिरुद्ध वर्मा (दिल्ली)
इक्कीसवीं सदी का मानव तकनीक से घिरा हुआ है, परंतु स्वयं से दूर होता जा रहा है। जिस गति से दुनिया आगे बढ़ रही है, उस गति में मनुष्य का आत्मबोध कहीं पीछे छूट गया है। हमने सुविधाएँ तो प्राप्त कर लीं, पर शांति खो दी। संवाद के साधन बढ़े, पर संवाद कम होता गया।
पहले रिश्ते समय मांगते थे, आज समय ही सबसे दुर्लभ संसाधन बन गया है। हम हर चीज़ को तुरंत पाना चाहते हैं—सफलता, पहचान, प्रेम—पर उसके लिए आवश्यक धैर्य खो बैठे हैं। परिणामस्वरूप, व्यक्ति भीड़ में रहते हुए भी अकेला महसूस करता है।
तकनीक ने हमें जोड़ा ज़रूर है, पर भावनात्मक दूरी बढ़ा दी है। हमें अब फिर से यह सोचना होगा कि क्या विकास का अर्थ केवल आगे बढ़ना है, या भीतर झाँकना भी उतना ही ज़रूरी है।
शिक्षा का बदलता स्वरूप और नई पीढ़ी
रचना मिश्रा (लखनऊ)
शिक्षा अब केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही। डिजिटल युग ने सीखने की परिभाषा बदल दी है। आज बच्चा मोबाइल स्क्रीन से सीख रहा है, लेकिन सवाल यह है—क्या वह समझ भी रहा है?
ज्ञान और जानकारी में अंतर है। जानकारी इंटरनेट दे सकता है, पर विवेक और समझ केवल मार्गदर्शन से आती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए।
आज की पीढ़ी के सामने अवसर अपार हैं, पर दिशा की कमी भी उतनी ही गहरी है। हमें शिक्षा को अंक आधारित प्रणाली से निकालकर जीवन मूल्य आधारित बनाना होगा।
तकनीक और मानव संवेदना का संघर्ष
शाकिर खान, गौरखपुर, भारत
तकनीक ने मानव जीवन को सरल बनाया है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उसी तकनीक ने भावनाओं को भी संक्षिप्त कर दिया है। अब संवाद इमोजी में होता है, भावनाएँ स्टेटस में सिमट गई हैं।
हम जुड़े हुए हैं, लेकिन गहराई से नहीं।
हम जानते सब कुछ हैं, पर समझते बहुत कम हैं।
जब मशीनें निर्णय लेने लगें और इंसान केवल प्रतिक्रिया देने लगे, तब सवाल उठता है—क्या हम तकनीक के स्वामी हैं या उसके अधीन?
समाधान तकनीक से भागना नहीं, बल्कि उसे समझदारी से अपनाना है।
समाज में बढ़ती असहिष्णुता की जड़ें
नेहा वर्मा , नयू यारक, अमेरिका
आज समाज में असहमति को शत्रुता समझा जाने लगा है। विचारों का मतभेद अब संवाद नहीं, टकराव बन गया है। सोशल मीडिया ने इस विभाजन को और गहरा कर दिया है।
विचारधाराएँ ज़रूरी हैं, पर जब वे मनुष्यता से ऊपर रखी जाती हैं, तब समाज टूटने लगता है। सहिष्णुता केवल सहन करना नहीं, बल्कि समझने का प्रयास है।
यदि हमें भविष्य को सुरक्षित बनाना है, तो हमें फिर से संवाद सीखना होगा — बिना नफ़रत, बिना डर के।
उम्मीद — एक शांत लेकिन अडिग शक्ति
समीर अंसारी (भोपाल)
अंधेरे समय में उम्मीद एक धीमी रोशनी की तरह होती है — बहुत तेज़ नहीं, लेकिन पर्याप्त। इतिहास गवाह है कि मानव सभ्यता ने सबसे कठिन दौर में भी आशा नहीं छोड़ी।
आज जब चारों ओर अनिश्चितता है, तब भी छोटे-छोटे प्रयास बदलाव की नींव रखते हैं। एक शिक्षक, एक लेखक, एक विचार — सब मिलकर भविष्य गढ़ते हैं।
उम्मीद कोई भ्रम नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की ताकत है।
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